इरफान फिल्मों का इत्र थे : राजेश अभय

राजेश अभय इरफान के कुछ अच्छे दोस्तों में से हैं, ये रिपोर्ट राजेश की,  इरफ़ान को श्रद्धांजलि है
नयी दिल्ली, तीन मई  अभिनय की दुनिया में एक नयी खुशबू पैदा करने वाले कलाकार इरफान खान ने समाज के विभिन्न वर्गो, संप्रदायों  और तबकों की सीमाओं को तोड़कर अपने विशिष्ट और जीवंत शैली से सभी कलाप्रेमियों के दिलों में जगह बनाई और उसका असमय जाना सिनेमा और कलाजगत को झकझोर दिया है।
इरफान के बीमार होने की खबर के साथ, देश में लॉकडाऊन लागू होने के बावजूद घरों में बैठकर विभिन्न, जाति, धर्म, वर्ग, बच्चे, युवा, महिला, बौद्धिक व चैतन्य लोग सभी ने जिस तरह से उसके स्वास्थ्य की दुआ मांगी वह जाति, धर्म, वर्ग आदि की सीमाओं को तोड़कर सभी कलाप्रेमियों को एक साथ खड़ा कर देता है।
इरफान की मित्र मंडली में निकटता रखने वालों को पता था कि इरफान मूलत: सूफियाना स्वभाव के हैं और उनके लिए कोई भी घटना, व्यक्ति, स्थितियां अछूत नहीं थे बल्कि जहां तक संभव हुआ, इरफान उसे जीने की कोशिश करते थे और उसमें एक सार्थक मायने की तलाश करते थे। वह जन समुदाय के यथार्थ को अपने चरित्र में उभार कर सामने लाने के हिमायती थे और अपने इस संपर्क सूत्र से जुड़ककर उन्हीं की भाषा में, उन्हीं की शैली में उनसे संवाद स्थापित करने में सिद्धहस्त थे।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में तीसरे वर्ष की पढ़ाई के दौरान इरफान से मेरी मुलाकात हुई थी और उसके बाद हम दोस्त बने जो उनकी अंतिम सांस तक जारी रहा।
इरफान से जब कभी पूछा जाता था कि वह फिल्मों का चयन किस आधार पर करते हैं तो वह बहुत संजीदगी से कहते थे जिस फिल्म का पूरा ढांचा कसा हो और उसमें निभाये जाने वाले चरित्र समाज की पेचीदगियों को उभारते हों और रोचक हों। वैसे तो इरफान को कई यथार्थपरक फिल्में पसंद थीं लेकिन उनकी हालीवुड की एक पसंदीदा फिल्म ‘सेन्ट आफ ए वूमन’ थी।
     इरफान के अक्शा बीच स्थित आवास पर उनसे हो रहे एक साक्षात्कार के दौरान उनकी पत्नी ने बताया कि ‘‘आपके भाईजान ने एक विज्ञापन करने से मना कर दिया जबकि इनके विज्ञापन की फीस से वह ढाई गुना ज्यादा पैसे दे रहा था।’’ इसका कारण पूछने पर इरफान सकुचाते हुए बोले, ‘‘अरे यार, वो विज्ञापन एक गुटखा कंपनी का था। मैं अपने बेटे बाबिल और अयान को कहता हूं कि गुटखा नहीं खाना चाहिये फिर में दूसरे के बच्चों को कैसे इस चीज को खाने को बोलूं?’’
     इरफान सामाजिक उद्देश्य, पैसों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। वह संपूर्ण रूप से कलावादी होने के पक्षधर भी नहीं थे। उनका कहना था कि कुछ कलावादी लोग सामाजिक विषयों पर सिर्फ अपने सुख के लिए फिल्म तो बनाते हैं और ऐसी फिल्मों को लेकर कुछ लोगों की सराहना से उनका पेट भर जाता है और जिनको इन फिल्मों को देखना चाहिये, उनतक फिल्म पहुंचती ही नहीं है।
उनका मानना था कि एक अच्छी फिल्म भाषा, देश, संस्कृतियों के बंधन से मुक्त होकर रूहानी हो जाती है और दर्शकों से वैसे ही संवाद करती हैं जैसे कोई अपना आदमी उनसे उनकी बात कर रहा हो। इस संदर्भ में उन्होंने अपनी वर्ष 2013 में रिलीज हुई फिल्म ‘लंच बॉक्स’ का अनुभव बताया कि विदेशों में इस फिल्म को कई स्थानों पर दर्शकों ने फिल्म देखने के बाद हॉल में खड़े होकर और तालियां बजाकर स्वागत किया। इरफान ने कहा कि अब तक विदेशी बाजारों में भारत की गरीबी को बेचकर तालियां बटोरी जाती थी लेकिन पहली बार मुंबई के लंच के डिब्बों को विभिन्न स्थानों तक पहुंचाने वाले एक बेहद स्थानीय और सच्ची कहानी को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों द्वारा पसंद किया गया।
     उन्होंने अपने एनएसडी में चयन होने के दिनों के बारे में बताया, ‘‘मैं जयपुर के अपने घर से जब रिक्शे में हॉलडॉल लेकर बस स्टॉप की ओर चला तो रिक्शे पर बड़ी अकड़ के साथ बैठा जैसे एक नये जीवन की यात्रा पर निकला हूं। एक अलग ही जज्बा था कि आज से एक नई साधना शुरु करनी है। मेरे घर वालों को बहुत पसंद नहीं था लेकिन मेरे जुनून के आगे सभी नतमस्तक हो गये। मैंने अपनी मां से बहाना बनाया कि यहां से पढ़ाई करके मैं प्रोफेसर बन जाऊंगा।’’
इरफान के अब्बा शाहजादे यासीन अली खान राजस्थान के जयपुर के पास टोंक के सम्मानित नवाब खानदान के थे और उनकी मां सईदा बेगम भी नबाव खानदान की थी। इरफान की बड़ी आपा (बहन) रुखसाना बेगम और भाई इमरान खान और सलमान खान हैं। इरफान के अब्बा ने बाद में जयपुर आकर कीमती पत्थरों और रत्नों का कारोबार किया। इरफान की पैदाइश जयपुर की है।
अपनी शुरुआती दिनों में इरफान ने निर्दशक गोविंद निहलानी की ‘भारत एक खोज’, चंद्रकांता, बनेगी अपनी बात, चाणक्य जैसे धारावाहिक, एक डॉक्टर की मौत, दृष्टि जैसे फिल्मों में काम किया। बॉलीवुड में अभिनय की पारसी थिएटर शैली का छाप था जिसमें अभिनेताओं के मनोभाव को बढ़ा चढ़ाकर नाटकीय शैली में पेश किया जाता है। आसिफ कपाडि़या की फिल्म ‘द बारियर’ (कास्टिंग डायरेक्टर- तिग्मांशु धूलिया) और निर्देशक के बतौर तिग्मांशु धूलिया की पहली फिल्म ‘हासिल’ ने हालीवुड से बालीबुड तक इरफान की एक अलग पहचान बनाई और उसके बाद इरफान ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।
 अपने दोस्तों में इरफान सूफी अभिनेता के रूप में माने जाते थे। जो आधुनिक अभिनय कला के दिग्गज स्टानालावस्की और जर्मनी के नाटककार ब्रेख्त के अभिनय शैली के बीच सामंजस्य पैदा करने में यकीन करते थे। स्टानालावस्की जहां ‘मेथड एक्टिंग’ में चरित्र में ढलने, उसे अपनाने पर जोर देते थे वहीं ब्रेख्त, चरित्र से रिश्ता बनाने और उसकी मनोदशा, उसके समग्र चिंतन, उसके आभामंडल को आत्मसात कर अपनी विशिष्टता के साथ अभिनय करने पर जोर देते थे। ब्रेख्त की शैली में चारित्र में जकड़ जाने के बजाय अपनी निजता के साथ उस चरित्र तक पहुंचने पर जोर होता था। हालांकि निर्देशक तिग्मांशु धूलिया, इमरान हस्नी जैसे कुछ निकटवर्ती मित्रों का मानना है कि ‘मेथड एक्टिंग’ की सीमाओं को लांघकर इरफान की अपनी एक खुद के द्वारा विकसित की गई शैली थी जिसमें जनसमुदाय से जुड़ाव की एक मजबूत गांठ थी और जिसे किसी प्रशिक्षण संस्थान द्वारा सिखाया नहीं जा सकता।
     एक साक्षात्कार के दौरान मैंने पूछा कि आपका एक्टिंग की ओर दिलचस्पी कैसे हुई। उन्होंने कहा, ‘‘किशोरावस्था के दिनों में मैंने एक हालीवुड की फिल्म देखी, उसमें नायक मार्लिन ब्रांडो थे और कई सीन में उनके कोई डॉयलॉग नहीं होते थे लेकिन दर्शक के बतौर मुझे उनके हर मनोभाव का पता लगता था कि उनके मन में क्या घुमड़ रहा है और उनकी क्या उलझन चल रही है। मैं अचंभित था कि ये कैसा जादू है कि वह बगैर कुछ कहे भी सब कुछ कह दे रहे हैं। इस अद्भभुत विधा की ओर यह मेरे जुड़ाव का पहला बिन्दु था। ऐसा लगता था कि उस व्यक्ति के आसपास की हवा में भी करेंट है, एक ऊर्जा बह रही है जो दर्शकों के दिलों को छू ले रहा है।
     एक बार मैंने सवाल किया कि क्या एनएसडी ने आपको एक्टर बनाया, उन्होंने कहा, ‘‘एक संस्थान कभी किसी को अभिनेता नहीं बना सकता। अभिनय तो एक साधना है, अभिनेता को खुद ही अपने पर बहुत काम करना होता है, इसके साथ उसे बगैर किसी पूर्वाग्रह के हर सामने आने वाली चीज से एक रिश्ता कायम करना होता है। कोई संस्थान आपको एक छत के नीचे बैठकर दुनिया की तमाम कला माध्यमों से परिचय का जरिया बन सकता है लेकिन हर किसी को अभिनय की अपनी खुद की एक परिभाषा गढ़नी चाहिये। एक बेहतर अभिनेता होने के लिए आपको सबसे पहले एक बेहतर इंसान बनना चाहिये। जब आप चरित्र की बारीकियों में डूबते हैं तो आपके रोयें, आपका मौन भी बोलने लगता है और दर्शक से आप एक अलग आध्यात्मिक एवं रूहानी  रिश्ता कायम करते हैं।’’
     वैसे तो इरफान को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और भारत सरकार की ओर से पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया था। लेकिन फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ को राष्ट्रीय पुरस्कार और इरफान को बेहरीन अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद उनकी अभिनय की सर्वोच्च ऊंचाई छूने की कवायद में कोई कमी नहीं आई।
इरफान के मित्र और पान सिंह तोमर में उनके बड़े भाई की भूमिका निभााने वाले इमरान हस्नी ने कहा, ‘‘आखिरी समय तक इरफान पहले की तरह ही दीखते थे। कुछ लोगों ने उनके ‘न्यूरो इंडोक्राइन ट्यूमर’ नामक नायाब कैंसर के दोबारा फैलने पर फर्जी फोटो सोशल मीडिया पर पेश किया जिसमें उनके शरीर पर अस्पताल के कपड़े भी गायब दिखाये गये हैं जबकि वास्तव में इरफान के चेहरे या सर के बाल में कोई बदलाव नहीं आया था। चेहरे पर हल्की दाढ़ी के अलावा सब कुछ पहले जैसा ही था।’’
निर्देशक तिग्मांशू धूलिया ने कहा, ‘‘इरफान की सबसे खास बात यह है कि उसमें अभिनय के जुनून के अलावा फिल्म स्टारों जैसा कुछ भी खास नहीं था। अभिनय के इस बुलंद सितारे में सब कुछ आम इंसानों जैसा ही था।’’
     सिनेमा को चिकने चुपड़े दिखने वाले कलाकारों की कैद से मुक्त कर आम प्रतिभाशाली लोगों के लिए इरफान की कला यात्रा का एक ही संदेश है, ‘‘अगर तुम्हारा जुनून सच्चा है, तो पहाड और चट्टानें भी रास्ता जरूर देंगी।’’

SOURCE: bhasa

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