दादा लख्मीचंद फ़िल्म नहीं धोखा है, लूट का धंधा जारी है?

By :- हेमंत अत्री

सूर्यकवि पंडित लख्मीचंद को महज़ नर्तक के रूप में पेश करके यशपाल शर्मा ने हरियाणा के शेक्सपियर व सूर्यकवि के प्रति घोर अन्याय किया है।जल्दबाज़ी और लागत कम रखने के फेर में पंडित जी के व्यक्तित्व और क्रतित्व का जो सत्यानाश इस फ़िल्म में किया गया है, वह अक्षम्य भी है और निंदनीय भी ।

पंडित जी की पहचान अनपढ़ होने के बावजूद वेद शास्त्रों का ज्ञान सुनकर मौक़े पर रागनी बना देने वाले हरियाणवी शेक्सपियर के रूप में पूरी दुनिया में है। सांग केवल उस दौर में एक विधा थी, क़िस्से कहानियों को पेश करने का ज़रिया । नाच केवल उसका एक हिस्सा भर था। फ़िल्म में पंडित जी की मूल विधा, कला और ख्याति के विपरीत उन्हें केवल नचनिए तक सीमित कर दिया गया । सस्ती और चलताऊ स्क्रिप्ट में न तो पंडित जी के जीवन काल, परिस्थितियों और हरियाणवी संस्कृति के प्रति योगदान का कोई ज़िक्र है और ना ही उनकी ख्याति का।

पंडित लख्मीचंद अपने समय के महानतम सांस्कृतिक राजदूत थे लेकिन उन पर फ़िल्म बनाते समय केवल बाज़ारू और सुनी-सुनाई बातों को आधार बना देना पूरे व्यक्तित्व के साथ घोर नाइंसाफ़ी है।

मेरी समझ में यह नहीं आया कि समूचे मीडिया में अब तक फ़िल्म पर कोई बेबाक़ समीक्षा क्यों नहीं आई ? क्या राजनेताओें के बाद फ़िल्मकारों की तिजोरियों ने भी अब कलम को बंदी बना लिया है ?

यशपाल शर्मा ने पंडित जी के वटवृक्ष जैसे व्यक्तित्व को बौना करने का जो निर्लज्ज व ओच्छा प्रयास किया है, उसके ख़िलाफ़ पूरे समाज व संस्कृति कर्मियों को आवाज़ उठानी चाहिए । काश आज पंडित केसी शर्मा जी ज़िंदा होता तो शायद यशपाल शर्मा दादा लख्मीचंद के साथ यह अक्षम्य अन्याय करने का दुस्साहस कभी नहीं कर पाते।

मेरे विचार में यशपाल शर्मा ऐसी लचर और दिशाहीन फ़िल्म ना ही बनाते तो बेहतर होता।

धिक्कार है उनके हरियाणवी होने के दावे पर ! दादा लख्मीचंद रूपी सूर्यकवि के ज्ञान, तप व ख्याति की लौ को बौना करने का पाप तो कोई मुंबइया धंधेबाज़ फ़िल्म निदेशक भी नहीं करता।

यशपाल जी, इतनी शर्मनिरपेक्षता आप कहाँ से लाए ? कोई राजनीतिक एजेंडा था या ज्ञान का कावेरी अभाव ? आपको पूरे देश व प्रदेश के संस्कृति कर्मियों व प्रेमियों से बिना शर्त माफ़ी माँगनी चाहिए !

तीन साल पहले बनी फ़िल्म के लिए हरियाणा सरकार से करोड़ों रूपए के अनुदान की फ़ाईल अब कैसे चल रही है और कौन चलवा रहा है ?  चंद सवाल, जो मन को झकझोर रहे हैं-

-लोकप्रिय इतिहास पुरूष पंडित लख्मीचंद पर बनी बायोपिक रूपी फ़िल्म में भी दो गीत/रागनी ऐसे जो उनके लिखे हुए ही नहीं हैं ? यह निर्माता का सतही पन दर्शाता है कि उसने बिना किसी गंभीर शोध के केवल बनाने के लिए फ़िल्म बना डाली !

-फ़िल्म के पहले ही सीन में जिस तरह नेहरू जी को रेत के टिब्बों में कुछ दर्जन लोगों को संबोधित करने व दादा लख्मीचंद के सामने उनको खड़ा करने की घटना दोनों को बौना करने की सुनियोजित राजनीतिक साज़िश है और यही फ़िल्म के पीछे छिपा एजेंडा है ? स्तब्ध करने वाली बात ये है कि फ़िल्म का ये हिस्सा शूटिंग पूरी होने के लंबे अर्से बाद कहीं से संकेत मिलने के बाद दोबारा शूट किया गया, बहुत बाद में ।

-तीन साल पहले बन चुकी ये फ़िल्म अभी क्यों रिलीज़ हुई ? टाइमिंग महत्वपूर्ण है। इसके पीछे मंशा क्या है ? राजनीतिक एजेंडा ?

-खेल ये भी चल रहा है कि यदि कोई विघ्न संतोषी बाबू फ़िल्म के पहले भाग के अनुदान पर भांझी मार दें तो सरकार से दूसरे भाग के लिए करोड़ों वसूल लो। जानकारों का मानना है कि पहले भाग में काम करने वाले किसी कलाकार को मेहनताना तक नहीं दिया गया और कुल लागत ही मात्र 50 लाख के क़रीब है।

-जब फ़िल्म के पहले भाग में दादा लख्मीचंद जी के व्यक्तित्व को एक नर्तक तक सीमित कर दिया गया तो अगले भाग का क्या हश्र होगा ? जिस कथानक का आधार ही मिस कनसीव्ड हो, वो इतने बड़े व्यक्तित्व से न्याय कैसे कर सकता है?

-प्रदेश के अधिकांश ख्याति प्राप्त कलाकारों को पहले भाग में तख़्त पर बिठाकर छुट्टी क्यों कर दी गई, उन्हें वांच्छित भूमिका क्यों नहीं दी गई?

और अंत में सबसे बड़ा सवाल, हरियाणवी संस्कृति के नाम पर बरसों से कमा खा रहे प्रदेश के ‘सांस्कृतिक गिद्ध ‘ फ़िल्म में दादा लख्मीचंद के क़द और योगदान की अनदेखी पर चुप क्यों हैं ? कोई बोल क्यों नहीं रहा ? सच तो यह है कि जातिवाद के आरोप तो ना फ़िल्म की समीक्षा ना लिखने का बहाना हैं। हक़ीक़त ये है कि वो अपने से बड़े गिद्ध का असली धंधेबाज़ चेहरा दिखाने से बचते हैं।

हमारा क्या है, मित्रों । हमें किसी का डर नहीं। साची कहना, सुखी रहना !

SOURCE: youtube.com